Saturday, March 26, 2011

जय जापान

नहीं रुकता हे आँखों से पानी, यह तूने क्या किया सुनामी, जापान को कैसा झटका दिया, समस्त विश्व को रुला दिया।

Friday, February 4, 2011

गुरु जी

भारतवर्ष में,
है गुरुओं की भरमार,
ऐसा क्यों
समझाओ यार।

गरीबी हटाने के लिए,
चाहिए पैसों का भण्डार,
गुरुओं का इस से,
नहीं कोई सरोकार।

पुल बनाने के लिए,
अनाज की उपज बढ़ाने के लिए,
चाँद पर जाने के लिए,
अस्पताल चलाने के लिए।

जनता इनके पास,
क्यों जाती है,
अपना धन,
श्रद्धा से चढ़ाती है।

लोग बेवकूफ या पागल हैं,
मैं नहीं जानता,
पढ़े-लिखे शायद ऐसा माने,
मैं नहीं मानता।

भक्त प्यार से जाता,
आस्था से शीश नवाता,
मन की शांति पाता,
गुरु जी के गुण गाता।

छिपा इन बातों में,
है एक मूल कारण,
दुखी एवं अशांत मानव,
चाहे इनका निवारण।

इस प्रबल चाह के आगे,
उसका विवेक नतमस्तक है,
और यह भी सत्य है,
वह जहां खड़ा था, वहीँ है।

Friday, November 12, 2010

मयूरी

मेघा उमड़-उमड़ आये,
शीत ब्यार लहराये,
आमों की डालियाँ झुकी जायें,
मयूरी तुम कब नाचोगी!

किस बात पे हो खफा,
किस कारण हो नाराज़,
प्रकृति बजा रही हर साज़,
मयूरी तुम कब नाचोगी!

आँखों की नमी बता रही,
याद पिया की सता रही,
आता नहीं जाने वाला,
मयूरी तुम कब नाचोगी!

दिल में लगा हे नश्तर,
सीने पर रख पत्थर,
इसे ही जीना कहते हैं,
मयूरी तुम कब नाचोगी!

छलनी हो झरना गिरता है,
सरिता सागर से मिलती है,
अस्तित्व अपना मिटाती है,
मयूरी तुम कब नाचोगी!

Sunday, October 24, 2010

युद्ध-पताका

मरे हुए लोग,
क्या बदलाव लायेंगे,
कुछ बचे हैं जीवित,
वे इन्कलाब लायेंगे।

उठालो अपने हाथ,
गूँज करे यह नारा,
ज़ुल्मों का करो नाश,
है ये देश हमारा।

सैलाब जब आता है,
किनारे टूटते हैं,
आन्दोलनों से ही,
जहां बदलते हैं।

सब कुछ तोड़ो,
चुप रहना छोड़ो,
लहराओ युद्ध-पताका,
बदलाव लाकर छोड़ो।

अग्रसर

छोटे-छोटे क़दमों से,
बड़े-बड़े क़दमों से,
सुख-शान्ति खो कर या पा कर,
मृत्यु की ओर अग्रसर।

कुछ खा कर या पी कर,
अथवा खाली पेट जी कर,
हार कर या जीत कर,
मृत्यु की ओर अग्रसर।

अमीर-गरीब,
ज्ञानी-अज्ञानी,
एक दिशा में जा रहे,
मृत्यु को गले लगा रहे।

फूलों जैसा हो,
काँटों जैसा हो,
जीवन जैसे भी चले,
मृत्यु की ओर चले।

मानो या न मानो,
जानो या न जानो,
जीवन चल-चल कर,
मृत्यु की ओर अग्रसर।

Sunday, August 8, 2010

मानसिक संतुलन

पूरे विश्व में,
यह हो रहा है,
मानसिक संतुलन,
बिगड़ रहा है।

अच्छा चाल-चलन,
घटता जा रहा है,
अविश्वास निरंतर,
बढता जा रहा है।

इर्षा और नफरत की आग में,
जलता जा रहा है,
लालच के अथाह सागर में,
डूबता जा रहा है।

ज्यादा पाने की चाह में,
सब कुछ खोता जा रहा है,
मानव धीरे-धीरे,
अमानुष होता जा रहा है।

एक-एक कर,
सबको छोड़ता जा रहा है,
अब ये आलम है,
अकेलापन खा रहा है।

भाग्य

मेरी बीवी,
खाना बनाती है,
कपडे धोती है,
भाग्य की बात है।

मेरी बेटी,
चाय भी नहीं बनाती,
खाली प्याला भी नहीं उठाती,
भाग्य की बात है।

लगता है,
भाग्य करवट ले रहा है,
लड़की-लड़के के अंतर को,
मिटा रहा है।

सदियों के गलत को,
जो भाग्य हो गया था,
अब भाग्य-विधाता उसे,
बदल रहा है।