Thursday, May 29, 2008

महत्ता

हवा पकड़ सकते नहीं,
लहरें गिन सकते नहीं,
महत्ता प्यार की,
समझ सकते नहीं।

मेरे काव्य संग्रह 'भँवर 'से

दो दिन

लहरों की भांति ,
उतार-चडाव ,
जीवन नहीं ,
शांति पड़ाव।

----मेरे काव्य संग्रह 'भँवर ' से

Sunday, May 4, 2008

आह

नेताओं को गरीबों के,
दर्द का अहसास है,
अधिकतर छीन लिया,
शेष खून की प्यास है।

देख कर इनका बहशीपन,
मन विचलित हो उठता है,
मारूं तो किस मौत मारूं,
हर दंड कम लगता है.

Sunday, April 20, 2008

व्याख्याता

पति यह हो या वह ,
पत्नी यह हो या वह ,
कुछ फरक नहीं पड़ता ,
विवाह रुपी पिंजडा नहीं बदलता ।

मेरे काव्य संग्रह " भँवर " से

Monday, March 31, 2008

नया दौर

पशुता के इस दौर में,
नंगेपन की होड़ में,
सेवा-भावना लुप्त हो गई,
मानवता ख़त्म हो गई।

Sunday, March 30, 2008

अपना-बेगाना

अपने तो अपने होते हैं,
वे जान से प्यारे होते हैं,
इस बदलती दुनिया में,
वे क्यों बेगाने होते हैं।

Wednesday, March 26, 2008

सही बात

नवजात शिशु से सीख,
भेद-भाव मिटाना,
हँसते हुए रोते हुए,
हर एक को गले लगाना।

छोटी-छोटी बातों पर,
यूं ही खुश हो जाना,
एक क्षण रूठ कर,
दूसरे पल मान जाना।